मीडिया के ही एक साथी अमित कुमार मिश्र ने जब होम लोन की ब्याज दरों को लेकर जो मुहिम शुरू की है, वह स्वागत योग्य है। देश में उदारीकरण की शुरुआत के साथ प्राइवेट बैंकों की संख्या तेजी से बढ़ी और फिर लगा कि हम जैसे लोगों को अपना आशियाना बनाने सपना साकार हो सकेगा। यह हुआ भी, क्योंकि सरकारी बैंकों में लोन को लेकर जो रवैया है, वह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन इसके साथ ही इन बैंकों का साहूकारी चरित्र भी सामने आया। पहले तो इन बैंकों की शर्तें तो आसान लगती हैं, फिर बाद में इनका हाल गांव के साहूकारों जैसा हो जा है। मेरे एक मित्र हैं। उन्होंने एक प्राइवेट बैंक ले लोन लेकर वसुंधरा में सन २००४ में एक फ्लैट खरीदा। उस समय बैंक ने कहा फ्लोटिंग पर पर लोन ले लीजिए, यह अच्छा रहेगा। उस समय उन्हें साढ़े सात पर्सेंट ब्याज पर ४ लाख रुपये लोन दिए गए। अब देखिए बैंक की बाजीगरी। लोन लेने के छह महीने के बाद ही ब्याज दर आठ पर्सेंट हो गया। फिर ९, १० फिर होते-होते १४ पर्सेंट तक पहुंच गया। बैंक ने तर्क दिया कि रिजर्व बैंक ने सीआरआर, रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट बढ़ा दिया है। उस रिजर्व बैंक के गवर्नर वाई वी रेड्डी हुआ करते थे। मुद्रास्फीती की बढ़ती दरों का बहाना लेकर उन्होंने सीआरआर, रेपो और रिवर्स रेट में खूब बढ़ोतरी की। चलिए रिजर्व बैंक ने यह सब किया तो आपने ब्याज की दरें बढ़ा दीं। फिर आया देश में तथाकथित मंदी का दौर। मंदी पर फिर कभी चर्चा होगी। इसके बाद रिजर्व बैंक ने सीआरआर, रेपो और रिवर्स रेपो में रेट में तीन सौ से लेकर चार सौ बेसिस पॉइंट कम कर दिए। लेकिन इन प्राइवेट बैंकों ने ब्याज दरें कम नहीं की। और तो और इन्होंने सरकार और रिजर्व बैंक की सिफारिशें भी मानने से इनकार कर दिया। अब आगे देखिए आगे-आगे क्या होता है। अब रिजर्व बैंक ने बेस रेट लागू करने की घोषणा की है। लेकिन इसका कितना लाभ मिलेगा यह तो आने वाला ही वक्त बताएगा। बहरहाल मनमोहन सिंह की सरकार की कार्यप्रणाली देखकर तो नहीं लगता है कि लोगों को कोई राहत मिलेगी। अब अमित से कहूंगा कि अपनी यह मुहिम जारी रखें। हम उनके साथ हैं।
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
प्रेम की पहली कविता
मीडिया में शुरआती दिनों के मित्र राजेश डोबरियाल की यह कविता सन 99 से मेरे पास सुरक्षित रखी हुई है। राजेश से अनुमति लेकर मैंने यह कविता अपने ब्लॉग पर डाली है।
एक उम्र होती है,
जब प्यार दिल में होता है।
फिर एक उम्र आती है,
जब प्यार कच्छे में उतर आता है।
फिर एक और उम्र आती है,
प्यार पैरों में पहुंच जाता है।
कुछ लोग होते हैं,
जिनके दिल में प्यार होता है।
कुछ लोग होते हैं,
जिनके कच्छे में रहता है प्यार।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं,
जिनके पैरों में ही पाया जाता है प्यार।
कभी-कभी प्यार रूप भी बदलता है-
कभी यह दिल से शुरू होता है और
फिर कच्छे में उतर जाता है।
कभी यह कच्छे से शुरू होता है और
दिल में घर बना लेता है।
कभी तो यह कमाल करता है,
पैरों से कच्छे और दिल का रास्ता तय करता है।
प्यार की कुछ अवस्थाएं होती हैं,
एक अवस्था होती है,
जब प्यार शिशु सा होता है,
तब सब-कुछ अच्छा लगता है,
दूसरी अवस्था में प्यार जवान सा हो जाता है,
तब यह सिर्फ अपनी सुविधा देखता है।
अंततः प्यार बुढ़ापे की दशा भी प्राप्त कर लेता है
तब यह बोझ सा हो जाता है।
एक उम्र होती है,

जब प्यार दिल में होता है।
फिर एक उम्र आती है,
जब प्यार कच्छे में उतर आता है।
फिर एक और उम्र आती है,
प्यार पैरों में पहुंच जाता है।
कुछ लोग होते हैं,
जिनके दिल में प्यार होता है।
कुछ लोग होते हैं,
जिनके कच्छे में रहता है प्यार।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं,
जिनके पैरों में ही पाया जाता है प्यार।
कभी-कभी प्यार रूप भी बदलता है-
कभी यह दिल से शुरू होता है और
फिर कच्छे में उतर जाता है।
कभी यह कच्छे से शुरू होता है और
दिल में घर बना लेता है।
कभी तो यह कमाल करता है,
पैरों से कच्छे और दिल का रास्ता तय करता है।
प्यार की कुछ अवस्थाएं होती हैं,
एक अवस्था होती है,
जब प्यार शिशु सा होता है,
तब सब-कुछ अच्छा लगता है,
दूसरी अवस्था में प्यार जवान सा हो जाता है,
तब यह सिर्फ अपनी सुविधा देखता है।
अंततः प्यार बुढ़ापे की दशा भी प्राप्त कर लेता है
तब यह बोझ सा हो जाता है।
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